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शून्य दोष शून्य प्रभाव (ZED) MSME क्लस्टर को बढ़ावा : एक CII मॉडल

श्री चंद्रजीत बनर्जी, महानिदेशक, CII

 

1998 से CII क्लस्टर मूवमेन्ट ने अद्वितीय तरीकों से विकास करते हुए भारतीय उत्पादन प्रतिस्पर्धी क्षमता पर उल्लेखनीय और सकारात्मक प्रभाव डाला है। आज पूरे भारत में 16 राज्यों और 3 संघशासित क्षेत्रों में 20+से अधिक प्रासंगिक सेक्टरों में लगभग 3000 कंपनियां प्रभावित हुई हैं जिनमें इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल से लेकर टेक्सटाइल, साइकिल पार्ट, FMCG आदि सेक्टर शामिल हैं

 

CII में क्लस्टर गतिविधि में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है जिसमें 6-12 कंपनियों के एक समूह को 12 से 24 महीनों के लिए एक साझा लक्ष्य दिया जाता है। यह प्रायः ऐसी कंपनियों की स्वैच्छिक पहल होती है जिनके मालिक/CEO दूरगामी सुधार फोकस पर केंद्रित होते हैं। मिलकर कार्य करना, मिलकर सीखना, और मिलकर सुधार करना क्लस्टर का सिद्धांत है। क्लस्टर 1998 में ऑटो कम्पोनेन्ट सेक्टर में शुरू हुए और प्रो. सुडा द्वारा निर्धारित रूपरेखा का पालन करते हुए कंपनी के कारोबारी 'उद्‌देश्य' के लिए 'सटीकता' की दिशा में बढ़ने का ध्येय बनाया। जब कंपनियों ने सटीकता लागू करने का प्रयास किया-तो इससे उन्होंने यह सीखा कि किस तरह से वे प्रतिस्पर्धी बनने के लिए अपने खुद के उपायों पर विचार करके उन्हें विकसित करेंगी। सटीकता की दिशा में शुरूआत करने वाली अधिकांश कंपनियां आज भारत में ऑटो कम्पोनेन्ट की बड़ी निर्माता कंपनियां हैं और उनमें से अनेक ने ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए सर्वोत्तम सप्लॉयरों के रूप में विश्वस्तर पर अपनी प्रतिष्ठा बनाई है। 1998 में मारूति के सप्लॉयरों के साथ साझेदारी में CII द्वारा निर्मित प्रथम क्लस्टर से सबसे हाल के शून्य प्रभाव और शून्य दोष (ZED) क्लस्टर तक, एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत अपरिवर्तित रहा है कि सभी कंपनियों को समान रूप से लाभ मिलना ही चाहिए

 

2000 से, प्रथम क्लस्टर से मिले सबक, CII के कुशल काउंसलरों द्वारा एक अधिक आसानी से लागू करने योग्य रोडमैप में स्थानांतरित किए गए हैं। CII ने बेसिक, एडवांस्ड, इंजीनियरिंग, और सबसे आधुनिक शून्य दोष और शून्य प्रभाव (ZED) क्लस्टरों के लिए कंपनियों के मूल्यांकन पर आधारित अधिकृत रोडमैप विकसित किए हैं। प्रथम ZED क्लस्टर में तीन नॉन-ऑटो कम्पोनेन्ट कंपनियां और पांच कंपनियां ऑटो कम्पोनेन्ट सेक्टर से शामिल हैं

 

ZED क्लस्टर को CII द्वारा अक्टूबर 2015 में स्थापित किया गया जब शून्य दोष और शून्य प्रभाव की दिशा में व्यावसायिक आवश्यकताओं वाली कंपनियां एक साथ आईं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिए गए एक सम्बोधन से इसकी प्रेरणा मिली, जिसमें उन्होंने मेक इन इंडिया तथा ZED (शून्य दोष और शून्य प्रभाव) हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया था। खासतौर से ऑटोमोटिव उद्योग में प्रोडक्ट्‌स रिकॉल किए जाने के प्रकरणों में हुई काफी बढ़ोत्तरी ने ZED को कारोबारी आवश्यकता बना दिया। सामान्यतया OEM बाज़ार की अस्थिरताओं का बोझ सप्लॉयरों पर डालना चाहते हैं और अपेक्षाकृत कम कीमतों पर शून्य दोष की मांग करते हैं

 

शून्य दोष और शून्य प्रभाव के लिए तकनीक आधारित सुधारों की आवश्यकता है। ये सुधार, किसी एक कंपनी के लिए अनुकूलित होते हैं और क्लस्टर की अवधि में निवेश वसूली की योजना के साथ विकसित किए जाते हैं

 

इंजीनियरिंग क्लस्टरों की प्रक्रिया बहुत समान है जहां पुराने या अप्रचलित उत्पादन संयंत्रों को नई पीढ़ी के उत्पादन संयंत्रों में रूपांतरित करने के लक्ष्य के साथ हस्तक्षेप किए जाते हैं। वर्तमान उत्पादन प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए रिइंजीनियर करने पर फोकस किया जाता है जिसके साथ सभी गैर-मूल्य संवर्धित (अपशिष्ट निस्तारण) गतिविधियों को समाप्त किया जाता है। कुछ प्रक्रियाओं के स्थान पर आधुनिक टूलिंग को लाना, पर्यावरण अनुकूल उत्पादन पर फोकस, सुरक्षा पर फोकस के साथ उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार को इसमें शामिल किया जा सकता है। यह किसी फैक्टरी को सभी प्रकार से एक लीन फैक्टरी बनाता है। यहां तक कि किन्हीं गैरज़रूरी पार्ट्‌स वाली बंद मशीनों को भी सरल बनाया जाता है और लीन मशीनों में बदला जाता है। ये मशीनें, बहुत कम संसाधनों का उपयोग करती हैं और अपेक्षित उत्पादकता, सुरक्षा और गुणवत्ता प्रदान करने वाले टूल इनमें होते हैं। टूलिंग, तथा सामग्री हैंडलिंग लॉजिस्टिक्स एक अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। इस प्रक्रिया के माध्यम से हैंडलिंग के दोष शून्य किए जाते हैं। गुणवत्ता, उत्पादकता और सुरक्षा के अलावा, प्रति कर्मचारी लागत मूल्य संवर्धन जैसे सूचक अब विश्व में सर्वोत्तम के तुलनीय हैं

 

इंजीनियरिंग क्लस्टर के लाभ काफी अधिक हैं क्योंकि इसके अंतर्गत तकनीकी हस्तक्षेपों के आधार पर सुधार किए जाते हैं और तद्‌नुरूप लेआउट बदले जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप जगह का बेहतर उपयोग होता है, कार्यस्थल पर गुणवत्ता, उत्पादकता और सुरक्षा में बढ़ोत्तरी होती है। इंजीनियरिंग क्लस्टर कंपनियां एक मॉडल लाइन में दो साल की समय अवधि के लिए साथ कार्य करती हैं। एक बार कंपनी द्वारा इसे मॉडल लाइन में लागू कर लिए जाने पर वे पूरे संयंत्र में इसे अपनी टीम द्वारा लागू करा सकती हैं। यह क्लस्टर गतिविधि किसी कंपनी की आंतरिक सक्षमता विकसित करके उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धी निर्माता में बदलने में मदद करती है

 

CII अवांता सेंटर फॉर कम्पटीटिवनेस फॉर SME में, हम क्लस्टर मूवमेन्ट और प्रक्रियाओं में विश्वास करते हैं। हम जापानी विशेषज्ञ प्रो. सुदा के बारे में बताना चाहेंगे जिन्होंने CII और भारत को पहली बार 1998-2000 में क्लस्टर प्रक्रिया के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि क्योंकि हमारे यहां भारत में अभी भी संयुक्त परिवार प्रणाली है, जहां 10-12 सदस्यों का विस्तृत परिवार, सामाजिक समस्याओं और चुनौतियों का सामना करने के दौरान परस्पर एक दूसरे को सपोर्ट करता है और संघर्ष समाधान के दौरान परिवार के मुखिया की राय को महत्त्व दिया जाता है। उनके अनुसार, भारत में क्लस्टर विधि सफल होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है