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भारत में घरेलू बचत: बढ़त की कहानी - सुश्री मधुरिमा चौधरी


रिलायंस कमर्शियल फाईनेंस — इकोनॉमिक इंटेलिजेंस दल।

घरेलू बचत को किसी गृहस्थी की प्रयोज्य आय और वस्तुओं व सेवाओं पर उसके उपभोग के बीच के अंतर के रूप में परिभाषित किया जाता है। घरेलू बचत महत्वपूर्ण है क्योंकि कम बचत दर वाली अर्थव्यवस्था अपनी निवेश की ज़रूरतों को घरेलू स्तर पर पोषित नहीं कर पाती है। ऐसे देश अपनी पूंजी निवेश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रायः विदेशों से उधार लेते हैं, और बकाया भुगतान घाटे में रहते हैं। साथ ही, जिन देशों में सामाजिक सुरक्षा मौजूद नहीं है, वहां घरेलू बचत ही बेरोज़गारी, सेवानिवृत्ति आदि के समय में सहारा बनती है। अन्य किसी भी सेक्टर की तुलना में भारत में पारंपरिक घरेलू बचत सबसे अधिक रही है (चित्र 1)

 

चित्र 1: भारत में विभिन्न सेक्टरों द्वारा कुल बचत की तुलना

स्रोत: भारतीय रिजर्व बैंक

 

घरेलू बचत आमतौर पर संपत्ति, सोने आदि वित्तीय और भौतिक परिसंपत्तियों के रूप में होती है। वर्ष 2014-15 में भारत की कुल घरेलू सेक्टर की बचत रु 23804.88 अरब थी जिसमें से रु 9613.07 अरब वित्तीय बचत थी और रु 13794.11 अरब की बचत भौतिक परिसंपत्तियों में थी। जैसा कि हम चित्र 1 में देख सकते हैं, वर्ष 2011-12 में समग्र घरेलू बचत सकल राष्ट्रीय प्रयोज्य आय (जीएनडीआई) का 23% थी जो वर्ष 2014-15 में घटकर 18.7% पर पहुंच गई। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि भौतिक निवेश जैसे सोना और अचल संपत्ति की तुलना में वित्तीय लिखतों जैसे बैंक जमाओं, शेयर और बीमा पर मिलने वाला रिटर्न कम रहा और महंगाई अधिक रही, जिसके कारण बचत के संघटन में बड़ा बदलाव हुआ (वित्तीय बचत से भौतिक बचत की ओर)

आइए देखें कि पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय परिसंपत्तियों में बचत किस प्रकार बढ़ी है। सभी आँकड़ों का स्रोत भारतीय रिजर्व बैंक है

 

बचत के रुझान

भारत के संदर्भ में, घरेलू वित्तीय बचत पिछले पाँच वर्षों के दौरान 2015-16 में सबसे अधिक रही है। वर्ष 2015-16 में निवल घरेलू वित्तीय बचत, सकल राष्ट्रीय प्रयोज्य आय (जीएनडीआई) का 7.7% थी (चित्र 2)। जीएनडीआई वह आय है जिसे निवासी अपने उपभोग व बचत के लिए वास्तव में प्रयोग कर सकते हैं। घरेलू वित्तीय बचत का गठन मुद्रा, जमाओं, शेयरों व डिबेंचरों, पेंशन व प्रोविडेंट फ़ंडों और सरकार पर दावों को मिलाकर होता है। सरकार पर दावे वे निवेश हैं जो डाकघर लघु बचत योजनाओं में किए जाते हैं

 

चित्र 2: घरेलू सेक्टर की वित्तीय बचत

स्रोत: भारतीय रिजर्व बैंक / इकोनॉमिक इंटेलिजेंस टीम

 

वित्तीय बचत में इस वृद्धि के मुख्य कारणों में से एक है खुदरा महंगाई - जिसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापा जाता है - का वर्ष 2012 के बाद से ठंडा पड़ना। चित्र 3 साफ तौर पर दिखाती है कि दिसंबर 2013 से सितंबर 2015 तक महंगाई नीचे आई है, जिसके बाद वह ऊपर उठी है। कम महंगाई दर के कारण बचत अधिक होती है क्योंकि गृहस्थियों को उतनी ही वस्तुओं व सेवाओं के उपभोग के लिए पहले जितना व्यय नहीं करना पड़ता है

 

चित्र 3: सीपीआई द्वारा मापा गया भारत का महंगाई का रुझान

स्रोत: सीआईआईसी/इकोनॉमिक इंटेलिजेंस टीम

 

भारत में महंगाई नवंबर 2013 में अपने शीर्ष पर 11.5% थी, दिसंबर 2014 में यह ढह कर 4.3% पर आ गई और पूरे 2015 में यह औसतन 5% के नीचे रही। सरकार और गवर्नर रघुराम राजन के अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए कदमों से इन वर्षों में महंगाई के आँकड़े नर्म बने रहे

घरेलू बचत का विस्तृत विवरण

 

(% of GNDI)

2011-12

2012-13

2013-14

2014-15

2015-16

सकल वित्तीय बचत

10.4

10.4

10.4

10

10.8

 

जिसमें से

 

 

 

 

 

 

मुद्रा

1.2

1.1

0.9

1.1

1.4

 

जमा राशियां

6

6

5.8

4.9

4.7

 

शेयर व डिबेंचर

0.2

0.2

0.4

0.4

0.7

 

सरकार पर दावे

-0.2

-0.1

0.1

0

0.4

 

इंश्योरेंस फ़ंड

2.2

1.8

1.6

1.9

2

 

प्रोविडेंट व पेंशन फ़ंड

1.1

1.5

1.6

1.6

1.5

बी

वित्तीय देयताएं

3.2

3.2

3

2.5

3

सी

निवल वित्तीय बचत (A-B)

7.2

7.2

7.4

7.5

7.7

तालिका 1: घरेलू सेक्टर की वित्तीय बचत

स्रोत: भारतीय रिजर्व बैंक

 

बैंक जमाओं में गिरावट
घरेलू सेक्टर की बचत के विस्तृत विवरण (तालिका 1) को देखें तो, वर्ष 2011-12 में बचत का अधिकांश भाग जमाराशियां थीं जो कुल रु 15391.77 अरब थीं - यह जीएनडीआई का लगभग 6% या घरेलू बचत का लगभग 58% थी। वर्ष 2015-16 में, यह गिरकर जीएनडीआई के 4.7% पर पहुंच गई जो समग्र घरेलू बचत का लगभग 43% है


इससे साफतौर पर पता चलता है कि (बैंकों की या अन्य) जमाओं में निवेश करने वाले अधिकांश लोग मौद्रिक भ्रम का शिकार हैं। वर्ष 2011-12 और 2012-13 में बैंक जमाओं की सांकेतिक दरें 9.0-10.0% के करीब थीं और सीपीआई द्वारा मापी गई महंगाई भी। यानि लोग जमाओं में निवेश किए गए धन की क्रय शक्ति खो रहे थे (क्योंकि वास्तविक ब्याज दर, सांकेतिक ब्याज दर में से महंगाई दर घटाने पर मिलती है)


तब से महंगाई गिर कर 5.0-6.0% के करीब पहुंच गई है। बैंक जमाओं पर ब्याज दरें भी गिर कर 7.0-7.5% के करीब पहुंच गई हैं। जो भी हो, अब जमाकर्ता अपनी जमा राशियों पर रिटर्न हासिल कर पा रहे हैं क्योंकि ब्याज की दर, महंगाई की दर से अधिक है। पहले निश्चित रूप से ऐसा नहीं था, और जमाकर्ता असल में जमाओं में निवेश बनाए रख कर क्रय शक्ति खो रहे थे


इससे पता चलता है कि लोग जमाओं से दूर क्यों हुए हैं। गिरती हुई सांकेतिक दरों के कारण उन्होने अपने निवेश अन्य साधनों में पहुंचा दिए हैं, हालांकि जमाओं का सांकेतिक रिटर्न अब धनात्मक है। जमाओं की ब्याज दरें आरंभ में ही निश्चित हो जाती हैं और उनकी अवधि के दौरान कभी संशोधित नहीं होती हैं


सरकार पर दावे
सरकार पर दावे खंड में देखें तो, वर्ष 2011-12 और 2012-13 में इन योजनाओं में कोई बचत नहीं की गई है बल्कि रकम निकाली गई है। जहां वर्ष 2011-12 में इन योजनाओं से निकासी लगभग रु 5097.25 अरब की थी, वहीं वर्ष 2012-13 में यह घटकर रु 2924.56 अरब पर पहुंच गई। हालांकि 2014-15 में इन योजनाओं में जमाओं और निकासी का अंतर शून्य था, पर 2015-16 में सरकारी योजनाओं में बचत में जीएनडीआई के 0.4% या रु 21587.60 अरब का उछाल देखने को मिला है। मूल रूप से इसका यह अर्थ है कि बचत करने वाली जनता ने अपना पैसा उन छोटी बचत योजनाओं में पहुंचाया है जहां फिलहाल सांकेतिक ब्याज दर, सावधि जमाओं पर मिलने वाली ब्याज दर से अधिक है


यह बिंदु इस बात को सामने लाता है कि छोटी बचत की ब्याज दर को मौजूदा महंगाई से जोड़ देने से इस दिशा में बचत का आकर्षण बढ़ा है। सरकार ने सितंबर में अपनी त्रैमासिक दर समीक्षा में छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दर में 0.1% की कटौती की है। परिणामस्वरूप, लोकप्रिय नेशनल सेविंग्स सर्टिफ़िकेट और पब्लिक प्रोविडेंट फ़ंड (पीपीएफ़) अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में 8% ब्याज पेश करेंगे जो कि अप्रैल-जून तिमाही में 8.1% थी


दरों में इस मामूली कटौती के बावजूद इन योजनाओं के रिटर्न सकारात्मक बने हुए हैं क्योंकि वे अगस्त 2016 की 5% की मौजूदा खुदरा महंगाई दर से ऊपर ही हैं। सरकारी योजनाओं के तहत बचत में बढ़त, सकारात्मक रिटर्न की ओर विस्थापन दर्शाती है


यहां ध्यान देने लायक एक रोचक बिंदु यह है कि वर्ष 2011-12 से 2015-16 तक, जमाओं और छोटी बचत योजनाओं की कुल बचत में वस्तुतः गिरावट हुई है। वर्ष 2011-12 में जमाओं और छोटी बचत योजनाओं का योग, जीएनडीआई का 5.8% था जबकि 2015-16 में यह 5.1% हो गया। इससे साफ दिखता है कि बचत को अधिक सकारात्मक रिटर्न वाले मार्गों (जैसे वित्तीय बाजार आदि) में भेज दिया गया है


शेयर और डिबेंचर
शेयरों और डिबेंचरों में निवेश में भी उछाल आया है: वे वर्ष 2014-15 में जीएनडीआई का 0.4% या रु 18121.56 अरब थे जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 0.7% या रु 37778.31 अरब हो गए हैं। यह भारतीय वित्त तंत्र के लिए अच्छी खबर है क्योंकि लोग अपने निवेश सावधि जमाओं से हटा कर अन्य रूपों जैसे शेयरों, डिबेंचरों और म्यूचुअल फंडों में डाल रहे हैं। यह वित्तीय बाजारों को और गहरा बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है


वर्ष 2011-12 से 2015-16 के बीच वित्तीय बाजारों (शेयरों व डिबेंचरों) में बचत रु 5097.25 अरब से रु 37778.31 अरब पहुंच गई जो 641% का जबर्दस्त उछाल है। इस प्रकार की बढ़त दर्शाती है कि महंगाई घटने से अधिक बचत करने की गुंजाइश बढ़ी है जिससे प्रयोज्य आय को अधिक रिटर्न की अपेक्षा वाले मार्गों पर भेजा जा रहा है। ऐसा आमतौर पर अर्थव्यवस्था के विकास करने पर अधिक आय और अधिक विकसित वित्तीय बाजारों के साथ होता है


मुद्रा भंडार
मुद्रा भंडार में भी उछाल आया है: वे वर्ष 2011-12 में जीएनडीआई का 1.2% या रु 3058.35 अरब थे जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 1.4% या रु 7555.66 अरब हो गए हैं। हालांकि इस बात का कोई स्पष्टीकरण मौजूद नहीं है कि यह आँकड़ा ऊपर क्यों गया, क्योंकि मुद्रा भंडार पर कोई ब्याज नहीं मिलती है। हालांकि, जो एक बात मन में आती है वह यह है कि यह मुद्रा देश के निचले आर्थिक वर्ग के पास जमा मुद्रा हो सकती है जो या तो बैंकों तक नहीं पहुंची थी या उसके पास बचत की गुंजाइश नहीं थी


पेंशन फ़ंड
जीएनडीआई के अंश के रूप में पेंशन में घरेलू बचत पिछले कुछ वर्षों से लगभग सपाट रही है, विशेष रूप से 2011-12 के बाद। प्रोविडेंट व पेंशन फ़ंड को मिलाकर कुल बचत 2011-12 में रु 2803.49 अरब थी जो वर्ष 2015-16 में रु 8095.35 अरब पर पहुंच गई

सकल वित्तीय बचत
भारत में सकल घरेलू वित्तीय बचत वर्ष 2014-15 में जीएनडीआई का 10% या रु 45303.91 अरब थी जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 10.8% या रु 58286.54 अरब पर पहुंच गई है। इससे निवल घरेलू वित्तीय बचत में वृद्धि हुई है और वह 2014-15 में जीएनडीपी के 7.5% या रु 33977.93 अरब से बढ़कर 2015-16 में रु 42095.83 अरब पर पहुंच गई है


सकल घरेलू वित्तीय बचत में आए उछाल और निवल घरेलू वित्तीय बचत में आए उछाल के बीच का उल्लेखनीय अंतर इस कारण से है क्योंकि निवल घरेलू वित्तीय बचत, सकल घरेलू वित्तीय बचत में से वित्तीय देयताएं घटाकर मिलती है


वित्तीय देयताएं वर्ष 2014-15 में जीएनडीआई का 2.5% या रु 11325.97 अरब थीं जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 3% या रु 16190.70 अरब हो गईं। हालांकि, जीएनडीआई के 3% के स्तर पर, घरेलू वित्तीय देयताएं वर्ष 2011-12 एवं 2012-13 के 3.2% के स्तर से अधिक दूर नहीं हैं। हालांकि यहां ध्यान देने योग्य एक रोचक बिंदु यह है कि वर्ष 2011-12 और 2015-16 के बीच वित्तीय देयताओं या घरेलू ऋणों में 95% से थोड़ा अधिक की वृद्धि हुई है, जो उस वृद्धि दर के समान है जो 111% पर जीएनडीआई ने दर्शाई है। इसका अर्थ है कि घरेलू ऋण में हुई वृद्धि, राष्ट्रीय प्रयोज्य आय में हुई वृद्धि जितनी समान दर से हुई है, जो अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है


अतः यह स्पष्ट है कि घरेलू ऋण स्वस्थ व सतर्क स्थिति में हैं और यह भारत के कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए भी अच्छा शगुन है जो शेयरों और डिबेंचरों के जरिए घरेलू सेक्टर से उधार हासिल कर सकता है। अधिक आय और वित्तीय साक्षरता के साथ, वित्तीय बाजारों में बचत का अंश बढ़ने की संभावना है