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सामाजिक जिम्मेदारी के जरिए सफलता-नंदी खादी ग्रामोद्योग का मामला

श्री नागराज गांधी, खादी के क्षेत्र में जाने-माने व्यक्ति हैं। अस्सी के दशक के आरंभ में मामूली शुरूआत करते हुए, खादी के कपड़े बनाने के लिए एक छोटा उत्पादन केंद्र शुरू करके और स्थानीय बुनकर समुदाय की मदद से 'नंदी खादी ग्रामोद्योग संघ' स्थापित करके उन्होंने कर्नाटक राज्य में खादी के क्षेत्र में अपना एक विशेष स्थान बनाया है। अब बंगलौर शहर में 12 से अधिक सेल्स आउटलेट, चिकबल्लापुर जिले में 5 उत्पादन केंद्रों, रू. 15 करोड़ से अधिक वार्षिक टर्नओवर, 'ए' ग्रेड सोसाइटी के रूप में सूचीबद्ध होने के साथ आज नंदी संघ अपने ब्रांड नाम 'खादी नेशन' के माध्यम से दक्षिण भारत में जाना-माना नाम बन चुका है। अपनी कारोबारी दक्षता, कठिन परिश्रम, बुद्धिमत्तापूर्ण विस्तार, और उत्पाद विविधता के द्वारा उन्होंने सोसाइटी को सुस्थापित नाम बना दिया है।
कर्नाटक राज्य में 800 से अधिक खादी समितियां हैं और टर्नओवर और बाज़ार हिस्सेदारी के मामले में नंदी सोसाइटी उनमें से शीर्ष दस में शामिल है। चिकबल्लापुर जिले के सिडलघट्‌टा प्रखंड में 30 गांवों के कारीगर सोसाइटी से जुड़े हैं, जो कि लगभग 300 महिला कारीगरों का कार्यस्थल है। समिति ने अपने कार्य के दौरान निम्न कुछ प्रमुख समस्याओं की पहचान की

  • समिति द्वारा चलाई जाने वाली इकाईयां, उनके घरों से 50 किमी. से अधिक दूरी पर स्थित होने के कारण महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर पहुंचना कठिन होता था
  • 10 किमी. के दायरे तथा 50 किमी. के दायरे में रहने वाली महिलाओं के लिए परिवहन सुविधाओं का अभाव था
  • उनके पारिश्रमिक, उनके बच्चों को शिक्षित बनाने के लिए भी पर्याप्त नहीं थे. इसलिए उनके बच्चे खेती जैसी गतिविधियों, तथा निकटवर्ती कपड़ा फैक्टरियों में अकुशल कर्मचारियों के रूप में कार्य करते थे.
  • 50% से अधिक कारीगरों के विभिन्न बीमारियों जैसे कि ब्रोंकाइटिस, दमा, रूमाटिज्म, आर्थराइटिस इत्यादि से ग्रस्त होने के कारण उनकी उपस्थिति और उत्पादकता कम थी. उनकी बीमारियों के कारण उनकी आजीविका भी प्रभावित होती थी.
 

इन मसलों को ध्यान में रखते हुए, समिति ने अपने कारीगरों के लिए सामाजिक पूंजी में निवेश करने का निश्चय किया। इनमें निम्न शामिल हैं

  • प्रवासी कारीगरों के लिए क्वार्टरों का प्रावधान, 50 से अधिक परिवारों के लिए पानी, मुफ्त बिजली और शौचालय जैसी सभी सुविधाओं से लैस आवास. समिति द्वारा कुल अनुमानित निवेश रू. 80 लाख है. इससे महिला कारीगरों के यात्रा समय की बचत हुई है.
  • 10 किमी. के दायरे में रहने वाली महिलाओं को उत्पादन केंद्रों तक मुफ्त लाने-ले जाने की सुविधा का इंतजाम.
  • कारीगरों के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और किताबों का इंतजाम, जो अपर्याप्त पारिश्रमिक के कारण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दिला पाते.
  • चिकबल्लापुर में स्थानीय स्कूलों की मदद से, कारीगरों के परिवारों के मेधावी विद्यार्थियों को रू 5000 से रू. 10000 तक की छात्रवृत्तियां प्रदान की जाती हैं.
  • 520 कारीगरों के पूरे स्वास्थ्य बीमे का भुगतान समिति द्वारा किया जाता है और कारीगरों की गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बंगलौर के प्रमुख अस्पतालों से करार किया गया है
  • अटल पेंशन योजना के अंतर्गत 50 से अधिक वरिष्ठ कारीगरों को कवर किया गया है.
  • सभी उत्पादन केंद्रों में कैंटीन खोली गईं, जहां 200 से अधिक कारीगरों को मुफ्त भोजन दिया जाता है.
  • मार्केटिंग आउटलेट्‌स पर, सभी सेल्स बॉयज और गर्ल्स को मुफ्त वर्दियां, खाना, बस का पास और चिकित्सा लाभ प्रदान किए जाते हैं.
  • कारीगर परिवारों के मनोरंजन के उद्‌देश्य से समिति उनके लिए वार्षिक भ्रमण कार्यक्रम आयोजित करती है.
 

हर साल समिति, कारीगर कल्याण गतिविधियों पर रू. 25 से 30 लाख से अधिक खर्च करती है।
ये प्रयास हालांकि सामाजिक प्रकार के हैं, लेकिन इनसे समिति को अपना कारोबार मजबूत बनाने में भी मदद मिली है, इस तरह से यह दोनों पक्षों के लिए लाभकारी स्थिति है
'सामाजिक जिम्मेदारी, कुछ बड़े कार्पोरेट घरानों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए, किसी व्यवसाय की सफलता का आकलन केवल उसके टर्नओवर और बाज़ार पहुंच से ही नहीं आंका जाना चाहिए बल्कि कल्याणकारी गतिविधियों पर दिए गए जोर को भी समान महत्त्व दिया जाना चाहिए,' ऐसा श्री नागराज गांधी ने बताया, इन बातों का उनकी समिति अक्षरशः पालन करती है।”