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डॉ राव एवं डॉ सरकार, डायरेक्टर, फ़ाउंडेशन फ़ॉर एमएसएमई क्लस्टर्स

एमएसएमई को फ़ाइनेंस की उपलब्धता, बाज़ार, टेक्नोलॉजी संबंधी बाधाओं, उपयुक्त मानव संसाधन तक पहुँच, कच्चे माल की उपलब्धता समेत कई चुनौतियों से गुजरना पड़ता है। इन उद्यमियों के सामने मौज़ूद बाधाओं में से फ़ाइनेंस एक मुख्य रुकावट है। अधिकांश मामलों में इसकी पूर्ति अपनी और दोस्तों व परिजनों की बचत से होती है, और कुछ मामलों में बैंक लोन इसकी पूर्ति करते हैं। इन देनदारियों का इस्तेमाल आमतौर पर मशीन, ज़मीन, बिल्डिंग और वर्किंग कैपिटल के भुगतान में होता है। उत्पाद तैयार हो जाने के बाद, उनकी मार्केटिंग का संघर्ष शुरू होता है, जिसके बाद वर्किंग कैपिटल जुटाने की कोशिशें फिर से शुरू होती हैं और इस प्रकार यह प्रक्रिया चलती रहती है। हालांकि कुछ एमएसएमई समझदार होते हैं और वे ये काम कुछ अलग ढंग से करते हैं

 
  1. विचार में निवेश: इस वर्ग के एमएसएमई साधारण उत्पादों के पीछे नहीं जाते जिनके साथ मार्केट प्रमोशन तथा वर्किंग कैपिटल के प्रबंधन की निश्चित और लंबे समय तक चलने वाली चुनौतियाँ जुड़ी होती हैं. बल्कि वे किसी बिल्कुल अलग किस्म के नए विचार को चुनते हैं और उसमें विशेषज्ञता हासिल करते हैं. हालांकि यह एक कठिन प्रतिज्ञा होती है, क्योंकि कई बार उन्हें नफ़े की जगह नुकसान के साथ शुरूआत करनी होती है, जो शुरूआती सालों में बढ़ता ही है और उसके बाद तेजी से छलांग लगाता है. पर वे उसे जोख़िम उठाने लायक विचार मानते हैं.

  2. क्लस्टरों में स्थापित होना:एमएसएमई के तौर पर व्यक्ति के पास अपने प्रचालन का भौगोलिक क्षेत्र चुनने का विकल्प होता है और वह किसी ऐसे क्षेत्र में यूनिट स्थापित करके थोड़ी तसल्ली हासिल कर सकता है जहाँ उसके पास पहले से व्यक्तिगत जुड़ाव या संपर्क होते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अधिकतर लोग खुद को टीम का खिलाड़ी नहीं मानते और अपनी फ़ैक्टरी की चारदीवारी के अंदर सब कुछ बनाने की योजना पहले ही बना चुके होते हैं. पर अभिनव वर्ग वाले एमएसएमई उन्हें उत्पादन ईको-सिस्टम का एक भाग मानते हैं और आउटसोर्सिंग को वरीयता देते हैं, और इसलिए वे क्लस्टरों में स्थापित होते हैं. इस प्रकार की सह-स्थापना बड़े पैमाने पर निर्माण की किफ़ायत हासिल करने में भी मदद देती है.

  3. एसेट न बनाएँ, एसेट के उपयोग में वृद्धि करें:ये स्मार्ट ऑपरेटर निर्माण मशीनों और बिल्डिंगों को न्यूनतम करते हैं, ख़ासतौर पर अपने नॉन-कोर क्षेत्रों में. इसके स्थान पर वे नॉन-कोर क्षेत्रों में प्रचालनों की आउटसोर्सिंग को वरीयता देते हैं. ऐसा करना उचित है क्योंकि निवल आय (नेट इनकम) को दोनों ओर से वृद्धि मिलती है - (a) देनदारी कम होने से निवल आय बढ़ती है, और (b) क्लस्टर में अप्रयुक्त क्षमता कम लागत पर उपलब्ध रहती है, जिससे निवल आय बढ़ती है.

  4. आर एंड डी में निवेश:स्मार्ट ऑपरेटर अपने जैसी फ़र्मों द्वारा बनाए जाने वाले उत्पादों के उत्पादन में सक्षम होने के बावजूद, विशेषज्ञता हासिल करने को वरीयता देते हैं. इससे उन्हें कुछ नया करने का समय और क्षमता मिल जाती है. चूंकि वे अधिकांशतः असेम्बलर होते हैं, इसलिए टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे वैश्विक घटनाक्रमों के कारण वे तुलनात्मक बढ़त आसानी से खो देते हैं. अतः वे आर एंड डी में भी भारी-भरकम निवेश करते हैं.

  5. वैश्विक लिंकेज बनाएं -पर साझेदार बने रहें: वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा में बने रहने का एक तरीका यह है कि वैश्विक स्तर पर जो फ़र्म प्रतिस्पर्धा में बनी हुई हैं उनसे व्यापारिक लिंकेज बनाए रखी जाए. यहाँ, उत्पाद में विशेषज्ञता से फ़र्म को उसका एक अलग, ख़ास स्थान मिल जाता है, जिससे वह चाहे जितनी भी छोटी क्यों न हो, समान स्थिति वाली बड़ी से बड़ी फ़र्मों के साथ संबंध बना पाती है.

  6. ईक्विटी तलाशें: पारंपरिक रूप से एमएसएमई खुद के पैसे या दोस्तों व परिजनों से लिए गए पैसे से शुरूआत के आदी होते हैं. अगले कदम के तौर पर वे डेट (ऋण) फ़ाइनेंसिंग के जरिए देनदारी बढ़ाते हैं. बहुत ही कम मामलों में ईक्विटी के विकल्प पर विचार करते हैं. ईक्विटी फ़ाइनेंसिंग से भी काफी ज़िम्मेदारीपूर्ण फ़ंक्शनिंग मिलती है. अधिकांश एमएसएमई को नहीं लगता कि वे इसके लिए तैयार हैं. हालांकि इसके साथ ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट के रूप में एक बड़ी राहत भी मिलती है, जिससे खुद को प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने में मदद मिलती ही है.

  7. पंजीयन कराएँ - use schemes: A number of schemes are available with Government of India and State Governments (www.msmefoundation.org). However 90 per cent of the MSMEs are not registered and they get disqualified to apply for it. It is important that MSMEs get registered. The recently announced Udyog Aadhar Scheme has made things very simple for applying and getting registered.
 

ज़ेन टेक्नोलॉजीज़ के ट्रेनिंग सिमुलेटर

1993 में अपनी स्थापना से ही, ज़ेन टेक्नोलॉजीज़ अत्याधुनिक ट्रेनिंग सिमुलेटर डिजाइन करने और बनाने में विशेषज्ञ है। जब हैदराबाद की 800 इंजीनियरिंग यूनिटों में से अधिकांश यूनिटें रोज़मर्रा की गतिविधियों में लगी हुईं थीं तब, एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, एक हार्डवेयर इंजीनियर और एक वित्त विशेषज्ञ की तिकड़ी ने एक ऐसी फ़र्म खड़ी करने की सोची जो अलग हो

ज़ेन टेक्नोलॉजीज़ की शुरूआत विशिष्ट उत्पादों के निर्माण के साथ हुई। उन्होंने अपना उत्पाद “जटिल, उच्च टेक्नोलॉजी उत्पादों के आयात स्थानापन्न” (इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूशन ऑफ़ कॉम्प्लेक्स हाई टेक्नोलॉजी प्रॉडक्ट) के रूप में चुना। ज़ेन ने केवल एक उत्पाद लाइन - ट्रेनिंग सिमुलेटर - की डिजाइनें तैयार करने और उनमें विशेषज्ञता हासिल करने में भारी निवेश किया। आर एंड डी प्रक्रिया 1989 में शुरू हुई थी। 1993 तक पहला उत्पाद तैयार हो गया था। उस समय तक ज़ेन अपने फ़ंड की अच्छी-ख़ासी रकम स्वाहा कर चुकी थी, जिसका अधिकांश हिस्सा शुभेच्छुओं से जुटाया गया था। इस विकट अवस्था में आईडीबीआई ने रु 100 लाख का लोन और रु 50 लाख की ईक्विटी देकर उनके इस साहसी उपक्रम को सहारा दिया। बाद में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) ने भी अनुदान और लोन देकर उनके उत्पाद - पहले लैब स्केल सिमुलेटर - को बनाने में सहारा दिया

आज ज़ेन का टर्नओवर रु 80 करोड़ से ऊपर है और वह अपने रेवेन्यू का 20 प्रतिशत आर एंड डी में लगाती है। ज़ेन ने मिलिटरी फ़ाइट सॉल्युशंस सिस्टम इन्टीग्रेटर में एडेड फ़ीचर सपोर्ट के लिए अमेरिका की एक फ़र्म से गठजोड़ भी किया है। ज़ेन टेक्नोलॉजीज़ के सीएमडी श्री अशोक अतलुरी कहते हैं, “...एमएसएमई बनाना एक ऐसा सफ़र है जिसमें, आपकी सारी योजनाओं के बावजूद, आप हमेशा आश्चर्यचकित होते ही रहेंगे। पर सफलता की तीन चाभियाँ ये हैं - (a) संसाधन कोई बाधा नहीं है, जितना कम उतना बेहतर, आप ऑप्टिमाइज़ करते हैं और कम नुकसान होता है, (b) कोई कमाल का आइडिया लाइए - पैसा पीछे-पीछे आएगा, (c) लोगों से मिलते रहिए - वे ही आपकी बढ़त के पड़ाव हैं...”